शनि प्रदोष व्रत क्या है ?

हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक मास की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत किया जाता है। जब यह त्रयोदशी तिथि शनिवार के दिन पड़ती है, तब उसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से भगवान शिव को समर्पित होता है, लेकिन शनिवार होने के कारण इस व्रत को करने से शनि देव की विशेष कृपा भी प्राप्त होती है। इसीलिए इसे शास्त्रों में द्विगुण फल देने वाला व्रत कहा गया है।

प्रदोष काल का शास्त्रीय महत्व क्या है ?

धर्मशास्त्रों के अनुसार प्रदोष काल सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले से 45 मिनट बाद तक का समय होता है। शिव पुराण में वर्णन है कि प्रदोष काल में भगवान शिव पृथ्वी पर विचरण करते हैं औरअपने भक्तों की प्रार्थनाएँ स्वीकार करते हैं। इसी कारण प्रदोष काल में किया गया शिव पूजन
अधिक पुण्य फल प्रदान करता है

शनि देव और भगवान शिव का संबंध

हिंदू धर्मशास्त्रों में भगवान शिव कोशनि देव का गुरु माना गया है। शनि देव कर्मों के अनुसार फल देते हैं, जबकि भगवान शिव कर्मों के साक्षी और करुणा के अधिष्ठाता हैं। ऐसी मान्यता है कि शिव भक्ति से शनि देव प्रसन्न होते हैं और अपने कठोर प्रभाव को कम कर देते हैं | इसीलिए शनि दोष शांति के लिए शिव पूजन को सर्वोत्तम उपाय माना गया है।

शनि प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व

शास्त्रों के अनुसार शनि प्रदोष व्रत करने से—

  • शनि दोष, साढ़ेसाती और ढैय्या का प्रभाव शांत होता है।
  • मनुष्य को कर्म बाधाओं से मुक्ति मिलती है।
  • जीवन में न्याय, स्थिरता और धैर्य का विकास होता है।

जब त्रयोदशी तिथि शनिवार के दिन पड़ती है, तब किया जाने वाला प्रदोष व्रत शनि प्रदोष व्रत कहलाता है। यह व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है और शनिवार होने के कारण इसमें शनि देव की विशेष कृपा भी प्राप्त होती है। इसलिए इसका धार्मिक महत्व सामान्य प्रदोष व्रत से अधिक माना गया है।

धर्मशास्त्रों के अनुसार शनि प्रदोष व्रत करने से—

  • पाप कर्मों का क्षय होता है।
  • जीवन के कष्टों में कमी आती है।
  • मानसिक शांति और आत्मबल बढ़ता है
  • भगवान शिव और शनि देव—दोनों की कृपा प्राप्त होती है।

शनि प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व केवल उपवास तक सीमित नहीं है,बल्कि यह कर्म शुद्धि, ग्रह शांति और आत्मिक उन्नति का साधन है। श्रद्धा और नियम से किया गया यह व्रत मनुष्य के जीवन में शांति, स्थिरता और धर्म की स्थापना करता है।

* ॐ नमः शिवाय | ॐ शं शनैश्चराय नमः *