घर में सुख-समृद्धि बनी रहे, धन की कमी न हो और मन में शांति रहे, यह हर परिवार की इच्छा होती है। हमारे ऋषियों ने माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए जो सबसे पुराना और प्रामाणिक मंत्र दिया है, वह है श्री सूक्त। दीपावली हो, शुक्रवार का व्रत हो या रोज़ की पूजा, श्री सूक्त पाठ पीढ़ियों से घरों और मंदिरों में होता आ रहा है।

संक्षेप में: श्री सूक्त (श्री सूक्तम्) ऋग्वेद के खिल भाग में आने वाला देवी लक्ष्मी का स्तोत्र है। इसमें 15 मुख्य ऋचाएँ और एक फलश्रुति ऋचा है। इसका पाठ धन, वैभव, यश और घर की खुशहाली के लिए किया जाता है, खासकर शुक्रवार, दीपावली और लक्ष्मी पूजा के दिन।

इस लेख में आपको श्री सूक्त का पूरा पाठ संस्कृत में मिलेगा, हर ऋचा का सरल हिंदी अर्थ, पाठ करने की आसान विधि, सही समय और इसके लाभ। अंत में वे सवाल भी हैं जो लोग अक्सर पूछते हैं।

श्री सूक्त क्या है?

श्री सूक्त माँ लक्ष्मी की स्तुति में रचा गया एक वैदिक सूक्त है। “श्री” शब्द लक्ष्मी का ही दूसरा नाम है, जिसका अर्थ है शोभा, समृद्धि और ऐश्वर्य। “सूक्त” का अर्थ है वेद का स्तोत्र या मंत्रों का समूह।

यह सूक्त ऋग्वेद के खिलसूक्तों में आता है। खिलसूक्त वे मंत्र हैं जो ऋग्वेद की मुख्य संहिता के परिशिष्ट के रूप में जुड़े हैं। श्री सूक्त पाँचवें मंडल के बाद पढ़ा जाता है।

इसकी एक खास बात यह है कि इसमें सीधे लक्ष्मी से नहीं, बल्कि अग्निदेव (जातवेदस्) से प्रार्थना की जाती है कि वे माँ लक्ष्मी को हमारे घर लेकर आएँ। वैदिक परंपरा में अग्नि को देवताओं तक संदेश पहुँचाने वाला माना गया है, इसलिए यह भाव बहुत स्वाभाविक है।

श्री सूक्त में सिर्फ़ धन की माँग नहीं है। इसमें अन्न, पशुधन, यश, सत्य वाणी, संतान और घर से दरिद्रता (अलक्ष्मी) को दूर करने की प्रार्थना भी है। यानी यह पूरे जीवन की समृद्धि का मंत्र है।

संपूर्ण श्री सूक्त पाठ (संस्कृत में, हिंदी अर्थ सहित)

नीचे श्री सूक्तम् की सभी ऋचाएँ क्रम से दी गई हैं। हर ऋचा के नीचे उसका सरल हिंदी अर्थ है, ताकि पाठ करते समय आप भाव भी समझ सकें।

ऋचा 1

हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥

अर्थ: हे अग्निदेव! सोने जैसे रंग वाली, पापों को हरने वाली, सोने और चाँदी की मालाएँ पहनने वाली, चंद्रमा जैसी शीतल और स्वर्णमयी लक्ष्मी को मेरे लिए बुलाइए।

ऋचा 2

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥

अर्थ: हे अग्निदेव! उस लक्ष्मी को मेरे पास लाइए जो कभी मुझे छोड़कर न जाएँ। उनकी कृपा से मुझे सोना, गायें, घोड़े और परिवार का सुख मिले।

ऋचा 3

अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम्॥

अर्थ: जिनके आगे घोड़े चलते हैं, जो रथ के बीच विराजती हैं और हाथियों की चिंघाड़ से जिनके आने का पता चलता है, उन श्री देवी को मैं बुलाता हूँ। माँ लक्ष्मी मुझ पर प्रसन्न हों।

ऋचा 4

कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्॥

अर्थ: जो आनंदरूपा हैं, मंद-मंद मुस्कुराती हैं, सोने के परकोटे से घिरी हैं, करुणा से भरी हैं, तेज से चमकती हैं, स्वयं तृप्त हैं और भक्तों को तृप्त करती हैं, कमल पर बैठी हैं और कमल जैसे रंग वाली हैं, उन श्री देवी का मैं आह्वान करता हूँ।

ऋचा 5

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥

अर्थ: चंद्रमा जैसी शीतल, प्रकाशमयी, यश से दमकती, देवताओं द्वारा पूजित और उदार लक्ष्मी की मैं शरण लेता हूँ। मेरी दरिद्रता नष्ट हो, इसलिए मैं आपको वरण करता हूँ।

ऋचा 6

आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः॥

अर्थ: हे सूर्य जैसी तेजस्वी देवी! आपके तप से बेल (बिल्व) का वृक्ष उत्पन्न हुआ। उसके फल मेरे भीतर के अज्ञान और बाहर की गरीबी, दोनों को दूर करें।

ऋचा 7

उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे॥

अर्थ: देवताओं के मित्र कुबेर और कीर्ति देवी, रत्नों के साथ मेरे पास आएँ। मैं इस देश में जन्मा हूँ, मुझे यश और समृद्धि मिले।

ऋचा 8

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्॥

अर्थ: भूख, प्यास और मलिनता से भरी, लक्ष्मी की बड़ी बहन अलक्ष्मी को मैं दूर करता हूँ। हे देवी! हर तरह के अभाव और तंगी को मेरे घर से निकाल दीजिए।

ऋचा 9

गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्॥

अर्थ: जिनके आने पर सुगंध फैल जाती है, जिन्हें कोई हरा नहीं सकता, जो सदा भरी-पूरी रहती हैं, अन्न और गोधन की समृद्धि देती हैं और सभी प्राणियों की स्वामिनी हैं, उन श्री देवी को मैं यहाँ बुलाता हूँ।

ऋचा 10

मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः॥

अर्थ: हमारे मन की इच्छाएँ और संकल्प पूरे हों, वाणी में सच्चाई रहे। पशुधन, सुंदरता, अन्न और यश के रूप में लक्ष्मी मुझमें बसें।

ऋचा 11

कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्॥

अर्थ: कर्दम ऋषि लक्ष्मी के पुत्र रूप में प्रसिद्ध हैं। हे कर्दम! आप मेरे यहाँ निवास करें और कमल की माला पहनने वाली माता लक्ष्मी को मेरे कुल में बसाएँ।

ऋचा 12

आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले॥

अर्थ: जल हमारे लिए स्नेह और मंगल उत्पन्न करे। हे लक्ष्मीपुत्र चिक्लीत! आप मेरे घर में रहें और माता लक्ष्मी को भी मेरे कुल में स्थायी रूप से बसाएँ।

ऋचा 13

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥

अर्थ: हे अग्निदेव! करुणा से भरी, कमल-सरोवर में रहने वाली, पोषण देने वाली, सुनहरे रंग की, कमल की माला पहनने वाली, चंद्रमा जैसी शीतल लक्ष्मी को मेरे पास लाइए।

ऋचा 14

आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥

अर्थ: हे अग्निदेव! कोमल हृदय वाली, धर्म का सहारा देने वाली, सुंदर वर्ण की, सोने की माला पहनने वाली, सूर्य जैसी तेजस्वी लक्ष्मी को मेरे पास लाइए।

ऋचा 15

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम्॥

अर्थ: हे अग्निदेव! वह लक्ष्मी मेरे पास लाइए जो कभी साथ न छोड़ें, जिनकी कृपा से मुझे भरपूर सोना, गायें, सेवक, घोड़े और परिवार-जन मिलें।

ऋचा 16 (फलश्रुति)

यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत्॥

अर्थ: जो व्यक्ति लक्ष्मी की कामना से, पवित्र और संयमित होकर रोज़ घी की आहुति दे और इन पंद्रह ऋचाओं का नियमित जप करे, उस पर लक्ष्मी की कृपा होती है।

॥ इति श्री सूक्तम् ॥

ध्यान दें: अलग-अलग परंपराओं में कुछ शब्दों में हल्का अंतर मिलता है, जैसे ऋचा 13 और 14 में “पुष्टिं/यष्टिं” और “पिङ्गलां/सुवर्णां”। कई जगह 16वीं ऋचा के बाद “पद्मानने पद्मविपद्मपत्रे” जैसे अतिरिक्त श्लोक भी पढ़े जाते हैं। अपने कुल या गुरु की परंपरा को ही मानें।

श्री सूक्त पाठ विधि (घर पर कैसे करें)

श्री सूक्त का पाठ घर पर आसानी से किया जा सकता है। इसके लिए किसी बड़े अनुष्ठान की ज़रूरत नहीं, बस साफ़ मन और नियम चाहिए।

  1. स्नान और स्थान: सुबह या शाम स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें। पूजा की जगह साफ़ करें और पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुँह करके आसन पर बैठें।
  2. चौकी सजाएँ: लाल या पीले कपड़े पर माँ लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र रखें। चाहें तो श्री यंत्र भी रख सकते हैं।
  3. दीपक और पूजन: घी का दीपक और धूप जलाएँ। माँ को कमल या लाल फूल, अक्षत, कुमकुम और मिठाई (खीर या सफ़ेद मिठाई) अर्पित करें।
  4. गणेश वंदना: पाठ से पहले “ॐ गं गणपतये नमः” बोलकर भगवान गणेश को याद करें।
  5. संकल्प: हाथ में थोड़ा जल लेकर मन में अपना नाम, गोत्र और पाठ का उद्देश्य बोलें, फिर जल ज़मीन पर छोड़ दें।
  6. पाठ करें: श्री सूक्त की सभी 16 ऋचाएँ शांत मन और साफ़ उच्चारण के साथ पढ़ें। शुरुआत में 1 पाठ काफ़ी है; श्रद्धा अनुसार 3, 11 या 108 पाठ भी किए जाते हैं।
  7. आरती और क्षमा प्रार्थना: अंत में लक्ष्मी जी की आरती करें और पूजा में हुई किसी भूल के लिए क्षमा माँगें। प्रसाद परिवार में बाँटें।

हवन करना चाहें तो हर ऋचा के अंत में “स्वाहा” बोलकर घी या खीर की आहुति दी जाती है। बड़े हवन या अनुष्ठान के लिए किसी जानकार पंडित की सलाह ज़रूर लें।

श्री सूक्त का पाठ कब करें?

श्री सूक्त किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है, लेकिन कुछ दिन इसके लिए विशेष शुभ माने जाते हैं:

  • शुक्रवार: यह माँ लक्ष्मी का दिन है, इसलिए हर शुक्रवार पाठ करने की परंपरा सबसे प्रचलित है।
  • दीपावली और धनतेरस: लक्ष्मी पूजन के समय श्री सूक्त का पाठ लगभग हर घर में होता है।
  • पूर्णिमा और शरद पूर्णिमा: इन रातों में लक्ष्मी पूजा का विशेष महत्व है।
  • वरलक्ष्मी व्रत और नवरात्रि: देवी उपासना के इन दिनों में भी यह पाठ किया जाता है।
  • नया काम या व्यापार शुरू करते समय: शुभ शुरुआत के लिए भी लोग श्री सूक्त पढ़ते हैं।

श्री सूक्त के लाभ

शास्त्रों और परंपरा के अनुसार नियमित श्री सूक्त पाठ से ये लाभ माने जाते हैं:

  • धन और स्थिरता: लक्ष्मी “अनपगामिनी” बनकर घर में टिकती हैं, यानी कमाया धन बना रहता है।
  • दरिद्रता से मुक्ति: आठवीं ऋचा अलक्ष्मी, यानी तंगी, कलह और अभाव को दूर करने की प्रार्थना है।
  • यश और मान-सम्मान: सातवीं ऋचा में कीर्ति और समृद्धि की कामना की गई है।
  • घर में सुख-शांति: ग्यारहवीं और बारहवीं ऋचा लक्ष्मी को पूरे कुल में बसाने की प्रार्थना हैं।
  • मन की शुद्धता: दसवीं ऋचा में सच्ची वाणी और पूरे होने वाले संकल्पों की कामना है, जो भीतर की समृद्धि से जुड़ी है।

सच तो यह है कि श्री सूक्त मेहनत का विकल्प नहीं, बल्कि उसका साथी है। ईमानदार परिश्रम और श्रद्धा, दोनों मिलें तो माँ लक्ष्मी की कृपा जल्दी अनुभव होती है।

श्री सूक्त से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

श्री सूक्त किस वेद में है?

श्री सूक्त ऋग्वेद के खिलसूक्तों में है। ये ऋग्वेद के परिशिष्ट मंत्र हैं, और श्री सूक्त पाँचवें मंडल के बाद आता है।

श्री सूक्त में कितनी ऋचाएँ हैं?

श्री सूक्त में 15 मुख्य ऋचाएँ हैं। 16वीं ऋचा “यः शुचिः प्रयतो भूत्वा” फलश्रुति है, जिसे ज़्यादातर परंपराएँ साथ में पढ़ती हैं।

श्री सूक्त का पाठ कितनी बार करना चाहिए?

रोज़ या हर शुक्रवार 1 पाठ से शुरुआत करें। विशेष कामना या अनुष्ठान में 11, 21 या 108 पाठ किए जाते हैं।

क्या महिलाएँ श्री सूक्त का पाठ कर सकती हैं?

हाँ, आज ज़्यादातर घरों में महिलाएँ श्रद्धा से श्री सूक्त का पाठ करती हैं। अगर आपके परिवार की कोई अलग परंपरा है, तो उसका सम्मान करें।

श्री सूक्त और लक्ष्मी सूक्त में क्या अंतर है?

श्री सूक्त ऋग्वेद खिल की 15 ऋचाओं वाला वैदिक सूक्त है। लक्ष्मी सूक्त अलग स्तोत्र है, जो कई पुस्तकों में श्री सूक्त के बाद “पद्मानने पद्मविपद्मपत्रे” जैसे श्लोकों से शुरू होता है।

क्या बिना संस्कृत जाने श्री सूक्त पढ़ सकते हैं?

हाँ। शुरुआत में किसी प्रामाणिक ऑडियो के साथ धीरे-धीरे पढ़ें और हिंदी अर्थ समझते रहें। भाव सच्चा हो तो उच्चारण धीरे-धीरे सुधर जाता है।

श्री सूक्त पाठ का सबसे अच्छा समय क्या है?

सुबह ब्रह्म मुहूर्त या शाम को संध्या के समय, दीपक जलाकर पाठ करना सबसे शुभ माना जाता है।

अंत में

श्री सूक्त हज़ारों साल पुराना होते हुए भी आज उतना ही जीवंत है। इसकी हर ऋचा में माँ लक्ष्मी से सिर्फ़ धन नहीं, बल्कि सच्चाई, यश, अन्न और घर की शांति माँगी गई है। अगर आप रोज़ न कर पाएँ, तो हर शुक्रवार श्रद्धा से एक बार श्री सूक्त पाठ ज़रूर करें।

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जय माँ लक्ष्मी!