होली भारतवर्ष का ऐसा पावन पर्व है, जो केवल रंगों की उमंग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आत्मिक शुद्धि, धर्म की विजय और मानवीय एकता का सशक्त संदेश देता है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह उत्सव ऋतु-परिवर्तन के साथ-साथ मन के परिवर्तन का भी अवसर देता है। हिंदू धर्मशास्त्रीय दृष्टि से होली का अर्थ है—अंतर के अंधकार को जलाकर प्रेम, करुणा और आनंद के रंग भरना।
हिंदू परंपरा में पर्व केवल मनोरंजन नहीं होते; वे जीवन-दर्शन सिखाते हैं। होली हमें स्मरण कराती है कि जैसे प्रकृति वसंत में नवजीवन धारण करती है, वैसे ही मनुष्य भी अपने भीतर के विकार त्यागकर नवीनता को अपनाए। यही कारण है कि भारत के हर क्षेत्र में होली विविध रूपों में मनाई जाती है, पर उसका मूल भाव एक ही रहता है—धर्म, भक्ति और समरसता।
1. हिंदू धर्मशास्त्र में होली
हिंदू धर्मशास्त्र, स्मृति-ग्रंथ और पुराणों में होली का उल्लेख धर्म और अधर्म के संघर्ष के रूप में मिलता है। यहाँ अग्नि-तत्त्व शुद्धि का प्रतीक बनता है। अग्नि केवल बाह्य मलिनता को नहीं, बल्कि अहंकार, भय, द्वेष और अज्ञान को भी भस्म करती है।
धर्मशास्त्रीय दृष्टि कहती है कि—
- धर्म (सत्य, करुणा, संयम) अंततः विजयी होता है।
- अधर्म (अहंकार, अन्याय) का विनाश निश्चित है।
इसी भाव से होली मनाने पर यह पर्व आत्मोन्नति का साधन बन जाता है।
2. होली क्यों मनाई जाती है?
होली धर्म की विजय, भक्ति की शक्ति और सामाजिक समरसता का पर्व है। होलिका-दहन अधर्म के नाश का प्रतीक है, जबकि रंगों की होली प्रेम, आनंद और समानता का संदेश देती है। यह पर्व मनुष्य को अहंकार त्यागकर करुणा अपनाने की प्रेरणा देता है।
3. होलिका-दहन का आध्यात्मिक अर्थ
होलिका-दहन बाह्य अनुष्ठान के साथ-साथ आंतरिक साधना का संकेत देता है। इस रात्रि जलती अग्नि हमें आमंत्रित करती है कि हम अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ और भय को समर्पित कर दें। सच्चा दहन वही है, जिसमें मनुष्य आत्मिक शुद्धि का संकल्प ले।
4. होलिका-दहन की पौराणिक कथा
बहुत प्राचीन समय की बात है। धरती पर हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली असुर राजा था। उसने कठोर तपस्या करके देवताओं से ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसका वध न दिन में हो, न रात में; न घर के भीतर, न बाहर; न किसी अस्त्र से, न शस्त्र से। इस वरदान के कारण उसका अहंकार बहुत बढ़ गया और वह स्वयं को भगवान मानने लगा।
हिरण्यकशिपु ने अपने राज्य में घोषणा कर दी कि अब कोई भी भगवान विष्णु की पूजा नहीं करेगा, केवल उसी की पूजा होगी। लेकिन उसके घर में ही उसका पुत्र प्रह्लाद था, जो बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था। प्रह्लाद हर समय नारायण का नाम जपता, भक्ति करता और सभी से प्रेम से बात करता।
जब हिरण्यकशिपु को यह पता चला, तो वह बहुत क्रोधित हुआ। उसने प्रह्लाद को समझाने की बहुत कोशिश की, डराया, धमकाया, यहाँ तक कि उसे मारने के भी अनेक प्रयास किए—कभी पहाड़ से गिराया, कभी विष दिया, कभी सर्पों के बीच छोड़ दिया। लेकिन हर बार भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गया।
अंत में हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका को बुलाया। होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जलेगी। योजना बनाई गई कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठेगी, जिससे प्रह्लाद जल जाएगा और होलिका सुरक्षित रहेगी। लेकिन हुआ ठीक इसका उलटा। जब होलिका प्रह्लाद को लेकर आग में बैठी, तब प्रह्लाद ने पूरे विश्वास और भक्ति से भगवान विष्णु का स्मरण किया। ईश्वर की कृपा से प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ, जबकि होलिका स्वयं आग में जलकर भस्म हो गई।
इस प्रकार अहंकार, अधर्म और अन्याय का अंत हुआ, और भक्ति, सत्य व धर्म की विजय हुई
5. भगवान श्रीकृष्ण, राधा और ब्रज की होली
ब्रज की होली हिंदू संस्कृति की सबसे मधुर और भावनात्मक परंपराओं में से एक है। यहाँ होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि भक्ति, प्रेम और आनंद का पर्व मानी जाती है। श्रीकृष्ण जब राधा और गोपियों के साथ रंग खेलते थे, तब वह लीला ईश्वर और भक्त के बीच निश्छल प्रेम का प्रतीक बन गई। ब्रज, विशेष रूप से मथुरा और वृंदावन में मनाई जाने वाली होली में कोई भेदभाव नहीं होता—सब एक-दूसरे को रंग लगाते हैं, हँसते हैं और आनंद बाँटते हैं। ब्रज की होली हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम पवित्र, सरल और निष्कपट होता है, और जब जीवन में भक्ति जुड़ जाती है, तब हर उत्सव आध्यात्मिक बन जाता है।
6. होली के रंगों का आध्यात्मिक अर्थ
रंग केवल दृश्य आनंद नहीं, वे जीवन-गुणों के प्रतीक हैं—
- लाल: प्रेम, ऊर्जा और साहस
- पीला: ज्ञान, पवित्रता और साधना
- हरा: प्रकृति, संतुलन और नवजीवन
- नीला: शांति, विश्वास और व्यापकता
इन रंगों के माध्यम से होली हमें जीवन के सभी गुणों को संतुलन के साथ अपनाने की प्रेरणा देती है।
7. शास्त्रानुसार होली (होलिका-दहन) पूजा विधि
1.पूजा से पहले की तैयारी
होलिका-दहन से पहले मन, वचन और कर्म से शुद्ध होना आवश्यक माना गया है।
- प्रातः स्नान करें
- स्वच्छ वस्त्र धारण करें
- मन में किसी के प्रति द्वेष या क्रोध न रखें
- संभव हो तो दिन में सात्त्विक भोजन करें
2. होलिका-दहन की पूजा-सामग्री
शास्त्रानुसार निम्न वस्तुएँ अर्पित की जाती हैं—
- सूखी लकड़ियाँ और गोबर के उपले
- गेहूँ की बालियाँ
- चना, जौ या उड़द
- कच्चा सूत (मौली)
- हल्दी की गाँठ
- गुलाल या अबीर
- जल, पुष्प और अक्षत
3.होलिका-दहन का शुभ समय
हिंदू धर्मशास्त्रों और पंचांग के अनुसार होलिका-दहन फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि की संध्या में, प्रदोष काल में किया जाता है। यही समय सबसे शुभ माना गया है। (ध्यान रखें: भद्रा काल में होलिका-दहन नहीं किया जाता
धर्मशास्त्रों के अनुसार भद्रा सूर्यदेव की पुत्री और शनि देव की बहन मानी जाती हैं। उन्हें स्वभाव से उग्र बताया गया है। जिस समय भद्रा पृथ्वीलोक में विचरण करती हैं वह समय भद्रा काल कहलाता है। मान्यता है कि भद्रा काल में किए गए कार्य का शुभ फल नहीं मिलता। इस अवधि में कोई भी शुभ या मांगलिक कार्य—जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, मुंडन, या होलिका-दहन—नहीं किए जाते।
9. होली और सामाजिक समरसता
होली सामाजिक समानता का पर्व है। इस दिन जाति, वर्ग, आयु के भेद मिट जाते हैं। पुराने मतभेद क्षमा में बदलते हैं। परिवार और समाज के संबंध सुदृढ़ होते हैं। यही होली का मानवीय संदेश है।
10. प्राकृतिक एवं आयुर्वेदिक होली
परंपरागत रूप से होली पलाश, टेसू, हल्दी, चंदन जैसे प्राकृतिक रंगों से खेली जाती थी। ये रंग स्वास्थ्यवर्धक होते हैं और पर्यावरण को हानि नहीं पहुँचाते। आज के समय में प्राकृतिक रंगों को अपनाना धर्म और प्रकृति—दोनों की सेवा है।
11. आधुनिक युग के लिए होली का संदेश
आज के व्यस्त और तनावपूर्ण जीवन में होली हमें सिखाती है—
- क्षमा और प्रेम को अपनाएँ
- प्रकृति का सम्मान करें
- मर्यादा के साथ उत्सव मनाएँ
यही होली का धार्मिक और व्यावहारिक मार्ग है।
अंततः, हिंदू धर्मशास्त्र में होली का महत्त्व यही है कि यह आत्मिक परिवर्तन का पर्व है। होलिका-दहन से हम अपने दोषों का दहन करें और रंगों की होली से जीवन में प्रेम, करुणा और आनंद भरें। यदि यह भाव हमारे आचरण में बस जाए, तो हर दिन होली बन सकता है—एक पवित्र, संतुलित और आनंदमय जीवन।
आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ।
